वरुथिनी एकादशी आज : व्रत से मिटते हैं पाप,विष्णु कृपा से जीवन होगा सुख-समृद्धि से भरपूर, पढ़िए कथा...

वरुथिनी एकादशी आज : व्रत से मिटते हैं पाप,विष्णु कृपा से  जीवन होगा सुख-समृद्धि से भरपूर, पढ़िए कथा...

हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी मानी जाने वाली वरुथिनी एकादशी आज श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। यह व्रत भगवान भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से उपवास और पूजा करने से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

*हजार यज्ञों के बराबर मिलता है पुण्य*

पुराणों के अनुसार, वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को हजारों यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है। यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी माना गया है, जो जीवन में कष्ट, आर्थिक परेशानी या मानसिक तनाव से गुजर रहे हों। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना से सभी बाधाएं दूर होती हैं।

*इस विधि से करें पूजा*

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर धूप, दीप, फल, फूल और तुलसी दल अर्पित करें। व्रत का संकल्प लेकर दिनभर उपवास रखें और विष्णु सहस्रनाम या एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधि अनुसार व्रत का पारण करें।

*जानें शुभ समय*

एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 अप्रैल रात्रि (लगभग)

एकादशी तिथि समाप्त: 13 अप्रैल रात्रि (लगभग)

पारण का समय: 14 अप्रैल सुबह (द्वादशी में)

(स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में परिवर्तन संभव है)

*इन बातों का रखें विशेष ध्यान*

इस दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है।

क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहें।

तामसिक भोजन और अनैतिक कार्यों से बचें।

*धार्मिक मान्यता*

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक वरुथिनी एकादशी का व्रत करता है, उसे न केवल इस जन्म में सुख मिलता है, बल्कि मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।

*श्री वरुथिनी एकादशी कथा*

प्राचीन काल में एक मांधाता नाम के एक राजा थे। वह काफी दानशील थे। साथ ही तप, धर्म-कर्म में विश्वास रखते थे. मांधाता नर्मदा नदी के तट पर राज करते थे। एक दिन राजा तपस्या के लिए जंगल में गए। वहां वह तपस्या में लीन होने के कारण उन्हें एहसास भी नहीं हुआ कि कब एक जंगली भालू आकर उनके पैर को चबाने लगा। उन्हें अनुभव हुआ फिर भी उन्होंने कष्ट सहकर भी अपनी तपस्या भंग नहीं की। भालू उन्हें घसीटता हुआ जंगल के बीच ले गया।
अब राजा के मन में भय उत्पन्न हुवा और उन्होंने सच्चे मन से भगवान विष्णु से करुण प्रार्थना की.भक्त की रक्षा हेतु भगवान विष्णु वहां प्रकट हुए और भालू को मोक्ष दे कर राजा की जान बचा ली। परंतु , तब तक भालू ने राजा का एक पैर खा लिया था।
ऐसे में भगवान विष्णु ने राजा को सलाह देते हुए कहा कि तुम मथुरा जाओ वहाँ मेरी वराह अवतार की आराधना करो और विधि एवं श्रद्धापूर्वक वरुथिनी एकादशी व्रत रखो. ऐसा करने से तुम्हारे पुर्वजन्म के पापकर्म जिस कारण तुम्हें ऐसा कष्ट प्राप्त हुवा वे भी नष्ट होंगे एवँ शरीर के अंग भी वापस हो जायेंगे. राजा ने पुर्ण विधि-विधान व श्रद्धा से वरुथिनी एकादशी का फलाहारी व्रत रखा जिससे उनका शरीर पूर्ण हो गया और जीवन प्रसन्नता से भर गया। मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्त हुआ. अतः जो भी वरुथिनी एकादशी व्रत रखता है व कथा श्रवण करता है उनके सारे पाप नष्ट होते हैं। ईस एकादशी के व्रत से अन्नदान तथा कन्यादान दोनों के बराबर फल मिलता है, जो मनुष्य लोभ के वश होकर कन्या का धन लेते हैं वे प्रलयकाल तक नरक में वास करते हैं या उनको अगले जन्म में बिलाव का जन्म लेना पड़ता है, जो मनुष्य प्रेम एवं धन सहित कन्या का दान करते हैं, उनके पुण्य को चित्रगुप्त भी लिखने में असमर्थ हैं,जो मनुष्य विधिवत इस एकादशी को करते हैं उनको पितरो सहित वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है, इस व्रत के महात्म्य को पढ़ने से एक हजार गोदान का फल मिलता है,
इसका फल गंगा स्नान के फल से भी अधिक है, साथ ही वैकुण्ठ की प्राप्ति भी होती है। ईस दिन पुरे दिन श्री नारायण नाम का जप करना व उनके दर्शन करना अत्यंत पुण्य प्रदायक होता है।

*प्रेम से बोलियें जगतस्वामी*
*????????श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की जय ????????*